नारी निकेतन: संवासिनियों से दुष्कर्म व गर्भपात कराने के मामले में नौ आरोपी दोषी करार, ऐसे हुआ खुलासा

देहरादून I देहरादून नारी निकेतन में दिव्यांग संवासिनियों से दुष्कर्म और गर्भपात कराने के मामले में नौ आरोपियों को अदालत ने दोषी करार दिया है। शासकीय अधिवक्ता संजीव सिसौदिया ने बताया कि आज देहरादून में अपर जिला जज षष्ठम की अदालत में सभी नौ आरोपियों का दोष सिद्ध हुआ।

बताया गया कि दोषियों की सजा पर आगामी सोमवार को बहस होगी। बता दें कि साल 2015 में अमर उजला ने देहरादून नारी निकतन में संवासिनियों से दुष्कर्म और गर्भपात कराने के बाद भ्रूण छुपाने का मामला प्रमुखता से उठाया था। नारी निकेतन के अंदर खाने हुए इस अपराध का खुलासा एक गुप्त पत्र द्वारा हुआ था जो अमर उजाला को भेजा गया था। 

समाज कल्याण निदेशक के नाम भेजा गया था ये पत्र

अमर उजाला ने 17 नवंबर, 2015 को गोपनीय पत्र के आधार पर संवासिनी के साथ रेप और गर्भपात का मुद्दा उठाया था। अगले दिन नारी निकेतन के अंदर की काली करतूत को छिपाने के लिए मीडियाकर्मियों पर पत्थरबाजी तक करा दी गई थी। 

अमर उजाला टीम ने हिम्मत नहीं हारी। प्रबोशन अधिकारी मीना बिष्ट ने तो मामले को सिरे से नकार दिया था। महिला कांग्रेस ने भी भ्रमण कर नारी निकेतन में कुछ ना होने की एक तरफा रिपोर्ट जारी कर दी थी। अमर उजाला ने नारी निकेतन में तीन मूक-बधिर संवासिनियों की वीडियो रिकार्डिंग को लेकर मूक-बधिर सांकेतिक भाषा के विशेषज्ञों की राय की रिपोर्ट को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। इसमें नारी निकेतन में अपराध होने के संकेत मिले, तब जाकर कहीं मामले को दबाने में लगे लोग बैकफुट पर आए। 

शोर-शराबा हुआ तो तत्कालीन डीएम ने एडीएम झरना कामठान की अगुवाई वाली जांच टीम गठित की गई। टीम ने तथ्यों के आधार रिपोर्ट दी थी कि नारी निकेतन में कुछ ना कुछ गड़बड़ है। शासन के आदेश पर तत्कालीन पुलिस अधीक्षक नगर अजय सिंह की अगुवाई में एसआईटी गठित हुई तो मूक बधिर पीड़ित संवासिनी तक पहुंचने में 48 घंटे से अधिक का समय नहीं लगा।

पत्र से सामने आया था घिनौना सच

मेडिकल आधार पर संवासिनी के गर्भपात की पुष्टि हुई तो अमर उजाला की मुहिम को पंख लग गए। एसआईटी ने अगले दिन दूधली के जंगल से भ्रूण बरामद किया तो पूरी खबर पर मोहर लग गई। इसके बाद शुरू हुआ कार्रवाई का सिलसिला। नारी निकेतन अधीक्षिका समेत कई लोगों को जेल जाना पड़ा।

नारी निकेतन के चौकीदार ने ही संवासिनी को अपनी हवस का शिकार बनाया था। डीएनए रिपोर्ट से इस पर मोहर भी लग गई थी। एसआईटी की जांच में आया कि दुराचार की घटना पर पर्दा डालने के लिए यह गर्भपात किया गया था। इस खुलासे के बाद शासन की नींद टूटी तो सुधार की प्रकिया शुरू हुई। मानसिक रोगी संवासिनी और मूक-बधिर को अलग-अलग करने के साथ मेडिकल व्यवस्था में सुधार हुआ।

मूक-बधिर की भाषा समझने के लिए अलग से एक्सपर्ट रखे गए। यही नहीं संवासिनी को नियमित योग कराने के साथ उन्हें धूप बत्ती, कैंडल आदि बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। मूक-बधिर संवासनियों को वोट तक अधिकार देने के लिए पहचान-पत्र बनाए गए। दो दर्जन के करीब संवासिनी को उनके घर तक पहुंचाने में भी अमर उजाला की सार्थक पहल परवान चढ़ी।

कोर्ट ने दिए थे 25 लाख रुपए मुआवजा देने के आदेश

देहरादून के केदारपुरम स्थित नारी निकेतन में वर्ष 2015 में मूक-बधिर महिला से बलात्कार और गर्भपात मामले में हाईकोर्ट ने पीड़िता को 25 लाख रुपये का मुआवजा अथवा 11 हजार रुपये प्रतिमाह आजीवन पेंशन देने का आदेश प्रदेश सरकार को दिया था। 

इस मामले में ‘अमर उजाला’ की पहल पर बड़ी जद्दोजहद के बाद एफआईआर दर्ज हो सकी थी। तफ्तीश शुरू हुई तो सच्चाई सामने आई। कोर्ट ने इसी जनहित याचिका के निस्तारण में सरकार को छह माह में जुवेनाइल जस्टिस रूल्स बनाने को भी कहा था।

हाईकोर्ट की अधिवक्ता शिवानी गंगवार ने जनहित याचिका दाखिल की थी। इसमें नारी निकेतन, देहरादून और राष्ट्रीय दृष्टि बाधित संस्थान जैसी संस्थाओं में महिलाओं और दिव्यांगों के साथ हो रहे शोषण पर सख्त कार्रवाई की मांग की गई थी। जनहित याचिका पर वरिष्ठ न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और जस्टिस शरद शर्मा की खंडपीठ ने सुनवाई की थी। 

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